क्या किसी को अपने आराध्य पर भरोसा है ?
हममे से बहुत से लोग धर्म प्रेमी होने का दावा करते है। वो अपने भगवान, आल्हा, गॉड की अपनी पद्ति के हिसाब से आराधना करते है।
पर जब भी मै उनको देखता हूँ कि तो सोचता हूँ कि क्या उनको अपने आराध्य पर भरोसा है। पूर्ण विश्वास है।
ज्यादातर मामलो में उनमे उस विश्वास की कमी होती है। यह विश्वास की ही कमी है कि वो जितना ज्यादा अपने आराध्य की आराधना करते है उतना ही ज्यादा उनमे कुंठा और दूसरे लोगो में अविश्वास की भावना बढ़ने लगती है।
यहाँ तक कि उनमे खुद पर भी विश्वास की भावना नहीं रहती।
चलो समझने कि कोशिश करते है
लोग आतंकवादी क्यों बनते है ?
क्या वो अपने आराध्य की आराधना नहीं करते है। करते है दूसरे लोगो से ज्यादा करते है। वो चाहते है कि केवल उनके आराध्य की ही पूजा हो और किसी की न हो।
पर क्या उनको अपने आराध्य पर विश्वास है ?
तो उत्तर होगा - नहीं
आतंकवाद को वर्तमान समय में एक ही लक्ष्य है कि दूसरे धर्मो के लोगो को मिटाना।
वो यह काम खुद करना चाहते है क्यूंकि उनको लगता है कि उनको यह करना चाहिए और विडंबना यह है कि वो अपने आराध्य को सबसे शक्तिशाली मानते है और मानते है कि सबकुछ उसकी वजह से है उसने ही सब कुछ बनाया है।
तो अगर कोई किसी चीज़ को बना सकता है तो बिगाड़ भी सकता है। तो अगर उनके आराध्य ने ही सब कुछ बनाया है तो दूसरे धर्म भी उन्होंने ही बनाये होंगे।
यही होगा।
अगर उनका आराध्य चाहे क्यूंकि सब शक्ति उनके हाथ में है तो उसको केवल एक क्षण लगेगा सभी धर्मो के लोगो को नष्ट करने में। तो अगर उसको एक क्षण लगेगा तो क्यों दुसरो को आज तक नष्ट नहीं किया।
अगर एक आतंकवादी को अपने आराध्य पर विश्वास हो तो वह सबकुछ उस पर ही छोड़ देगा कि हे आराध्य जब आपकी इच्छा होगी तभी सबका विनाश होगा तो आप इसी क्षण सबको नष्ट कर दो।
पर नहीं उसको अपने आराध्य पर विश्वास नहीं है तभी उसको लगता है कि अपने आराध्य का काम मै करूंगा क्यूंकि उसके बस में कुछ नहीं है।
एक तो मात्र एक उदाहरण था।
ऐसा ही सब के साथ होता है। वो अपने आराध्य की आराधना तो करते है पर उस पर विश्वास नहीं करते और दुसरो का बुरा करने में लग जाते है। बजाये इसके की खुद पर और अपने आराध्य पर विश्वास करके केवल अपनी और मानवता की भलाई के लिए काम किया जाये