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Showing posts from May, 2021

वैश्विक संस्थाओ की सच्चाई !

जब भी विश्व जुड़े किसी संगठन की बात आती है या पर्यावरण से जुड़े या जीवो से जुड़े या किसी भी ऐसे संगठन जो लोक हित में बनाया गया हो। उसको बनाने का उदेश्य हो सकता है अच्छा रहा हो परन्तु कुछ समय बाद वह किसी न किसी देश, कंपनी या व्यक्ति इत्यादि के हाथो की कठपुतली ही बन कर रह जाता है। अगर हम कुछ संगठनो की बात करे जैसे सयुंक्त राष्ट्र संघ, विश्व स्वास्थ्य संगठन, संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन, पीपुल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स, पर्यावरण संगठन तथा ओर भी बहुत सारी सामाजिक संस्थाएं एक अच्छे ध्यये के लिए शुरू हुए थे और उनके पीछे एक महान प्ररेणा थी। पर समय के साथ ज्यादातर संगठन अपने वास्तविक उदेश्य से भटक गए और केवल किसी देश, व्यक्ति या संस्था के हाथ की कटपुतली बन जाते है और फिर वो दान लेने के लिए या जिस देश, संस्था या व्यक्ति से अधिक दान मिल रहा होता है इसके हिसाब से कार्य करने लग जाते है। दुनिया के सारे संगठन अपने नाम के पीछे अपने काले कारनामे छुपाने की कोशिश करते है या कुछ लोग अपने स्वार्थ के लिए इनके पीछे छिपने की कोशिश करते है। इसीलिए किसी भी संगठन पर विश्वास खुद के...

कटटरता किसी भी धर्म के लिए बोझ बन जाती है !

 कटटरता एक आवरण की तरह होती है।  वो कुछ तह तक तो सुरक्षा देता है पर अगर आप तह पर तह चढ़ाते जाओगे तो एक दिन आपका सुरक्षात्मक आवरण आपके लिए बोझ बन जायेगा। या तो आप उसके नीचे दब कर मर जाओगे या आप पूरा का पूरा आवरण ही त्याग दोगे और बिना आवरण के रहना पड़ेगा क्युकी आवरण की पीड़ा अब भी आपका पीछा नहीं छोड़ेगी।  किसी धर्म के लिए उसकी कटटरता भी यही काम करती है। एक स्तर तक तो वो उसकी रक्षा कर सकती है पर अगर उसको बढ़ाते जाओगे तो वो उस धर्म के लिए ही आत्म भक्षक सिद्ध होगी और उस धर्म के विनाश का कारण बनती है। इसीलिए अगर आप अपने धर्म को सुरक्षित रखना चाहते हो तो आपको कटटरता का आवरण की तरह ही उपयोग करना चाहिए।  अगर कटटरता का अनावश्यक रूप से हर बार उपयोग किया जाने लगा तो उस धर्म का बहुत ही जल्द विनाश सम्भव है।  हर धर्म को लगता है कि उसका धर्म अमर है और वो कभी भी खत्म नहीं होगा इसीलिए वो उसको और कटटरता से भरते रहते है ताकि वो अपने धर्म को सुरक्षित कर सके किन्तु हो इसका विपरीत हो रहा होता है और धर्म अपने विनाश की तरफ बढ़ रहा होता है।  दुनिया में आज मजूद धर्मो से पहले भी बहुत सारे ध...

क्या हमारे विचार किसी कार्य के परिणामो पर असर डालते है ?

हो सकता है कि मै यहाँ पर गलत हूँ पर मैंने एक चीज़ महसूस की है कि हमे हमारे कर्मो के हिसाब से मिलता है। हम किसी कार्य को किस विचार या भावना से कर रहे है उसका उसके परिणाम पर बहुत गहरा फर्क पड़ता है।  दो व्यक्ति अगर एक ही काम को एक ही तरह से एक ही समय पर करते है। एक जितनी मेहनत करते है। एक जितना समय देते है। हर प्रतिकिर्या समान होती है तब भी परिणाम बहुत ज्यादा अंतर् वाला हो सकता है।  दो किसान एक ही समय पर फसल बोते है। बिलकुल समान अवधि में पानी देते है , खाद देते है, एक ही जैसे मौसम को दोनों किसानो की फसल सहन करती है, और वो सभी कार्य एक ही तरह करते है पर फसल का जो उत्पादन होता है वो बिलकुल अलग होता है।  ऐसा क्यों ? इसका उत्तर कोई भी सही तरह नहीं दे सकता। पर यह सार्वभौमिक सत्य की कभी भी परिणाम समान नहीं होगा।  हमारे कर्मो के अतरिक्त हमारे विचार और हमारी उस कार्य के पीछे की भावना भी बहुत हद तक उसके परिणाम को परवर्तित करती है। इस विषय पर एक अनुशंधान की जरूरत है कि यह किस तरह होता है।  "किताब 'as the man thinketh' के अनुसार आपको आपके विचारो के हिसाब से परिणाम मिलता ह...

यह मेरी जिंदगी के सबसे बड़ी उलझनों में से एक है।

 यह मेरी  जिंदगी के सबसे बड़ी उलझनों में से एक है।  आप आज क्या फैसला लेते हो, इसका कोई नहीं बता सकता कि भविष्य में क्या असर आपकी जिंदगी पर होगा। किसी के पास कोई समय यात्रा यंत्र नहीं है। कोई यह नहीं बता सकता कि आप यह फैसला लोगे तो यह हो जायेगा , यह लोगे तो यह हो जायेगा। आपको अपनी जिंदगी के फैसले बिना यह सोचे लेने पड़ेंगे कि क्या सही है और क्या गलत।  जिंदगी के बहुत महत्वपूर्ण फैसलों के समय हमारे पास नाम मात्र का समय होता है। वहां हमे करो या मरो वाले फैसले लेने पड़ते है।  जिंदगी के इस मोड़ पर आकर मै रुक गया हूँ। मुझे नहीं पता कि क्या करना है , क्या नहीं करना है। इस वक़्त मै अपनी जिंदगी के सबसे अधिक समय वाले दौर से गुजर रहा हूँ। बहुत सारे डर है , बहुत सारी उलझने। मैंने अपने पिछले सात साल अपने व्यवसाय को स्थापित करने में लगाए। मेरे जीवन के सबसे व्यस्त समय में से एक था वो।  मुझे अपने जीवन के उस दौर का आनंद लिया है। मुझे अपने जीवन के उन सबसे व्यस्त सालो पर फक्र है। जिस तरह मै जीना चाहता था वो बिलकुल उसी तरह थे।  पर मै अब जिंदगी को समझना चाहता हूँ। गहराई से ढूंढ़ना...

धर्म, देश और व्यक्ति, तीनो का जीवन चक्र एक ही तरह चलता है।

धर्म, देश और व्यक्ति, तीनो का जीवन चक्र एक ही तरह चलता है। समय की गणना में या ज्यादा कम में कुछ अंतर् हो सकता है पर इनके जीवन चक्र में बहुत समानताये होती है।  जन्म  बचपन  किशोर अवस्था  जवानी  बुढ़ापा  मौत/अंत  इसके अलवा इनके कर्मो और प्रवर्ति के हिसाब से यह  तय होता है कि धर्म अपने बुढ़ापे में या देश अपने बुढ़ापे में किस तरह अपना समय व्यतीत करेगा।  एक व्यक्ति अपने कर्म, अपने विचार, अपने भविष्य के लिए स्वयं जिमेवार होता है। एक धर्म, उसको मानने वाले सभी लोगो के कर्मो, विचारो से अपना भविष्य तय करता है। एक देश, उसके अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी लोगो के कर्मो और विचारो से अपना भविष्य तय करता है।  एक व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके जन्म से लेकर उसकी किशोर अवस्था तक की घटनाओ पर निर्भर करता है। उसके साथ उसके बचपन में क्या हुआ, किस तरह उसका लालन पालन हुआ, उसका अनुभव किस मामले में क्या था। यह सब उसके व्यक्तित्व को बनाता है।  दूसरे व्यक्तियों के साथ वो विनर्मता से पेश आता है या स्वार्थ पूर्ण नजरिया रखता है। वो दुसरो की मद्दत करने में तत्पर रहता है ...

क्या धन अपने आप में बुरा है ? क्या पैसा सब बुराइयों की जड़ है ?

 क्या धन अपने आप में बुरा है ? क्या पैसा सब बुराइयों की जड़ है ? अगर ऐसा है तो क्यों फिर सब पैसो के पीछे अपनी सारी जिंदगी गुजार देते है। क्यों लोग दिन रात बुरा बनने के लिए काम कर रहे है ? तो क्या हम सब बुरे है क्युकी हम सब धन के लिए ही सारे कार्य करते है। नौकरी, व्यवसाय, राजनीती और भी बहुत कुछ।  धन के अगर इतिहास की बात की जाये तो हम मुनष्य करीबन 6000 साल से पहले से धन का उपयोग कर रहे है। ये अलग बात है कि उस वक़्त पैसे आज वाले रूप में नहीं थे। तब चांदी, ताम्बे, सोने के सिक्के या मोहरे चलती थी। समय के साथ साथ धन का प्रकार बदलता रहा और आज यह अपनी वर्तमान स्थिति में है। कल क्या पता किस रूप में हो ? हर धर्म ने धन को अपने ग्रंथो में स्थान दिया है और ज्यादातर ने धन को गलत नजर से ही देखा है। लगभग सभी ने धन को बुराइयों की जड़ कहा है।  चलो आज जानने की कोशिस करते है कि क्या वास्तव में धन बुरा है ? धन बुरा नहीं हो सकता, क्यूंकि धन से बहुत सारे अच्छे काम भी किये जाते है। वर्तमान समय में धन से ही हमारे जीवन के जीने योग्य सामान खरीदे जा सकते है। एक सम्मान पूरक जिंदगी जीने के लिए आज के समय ...

प्रलोभन धर्म का दूसरा सिद्वांत है।

कल मेरे से कुछ ऐसा हुआ जिससे मुझे अहसास हुआ कि हम जिंदगी भर कुछ अतरिक्त पाने में लगे रहते है। पर उस अतरिक्त के साथ कुछ शर्ते जुडी रहती है। कुछ ऐसा ही धर्मो के साथ भी होता है। हर धर्म एक ऐसी जन्नत , स्वर्ग या हेवन देने का प्रलोभन देता है जो हमारी जिंदगी में हमे कुछ अतरिक्त पाने का अहसास दिलाता है। पर इस तथाकथित जन्नत , स्वर्ग या हेवन को पाने के लिए कुछ शर्ते होती है। ग्रंथो के हिसाब से धर्म वक्ता आपको वो सारी शर्ते बता देंगे पर हर शर्त के साथ एक दूसरी शर्त जुडी होती है जो इस प्रक्रिया को और ज्यादा जटिल बना देती है। अगर व्यवारिक तौर पर बात करे तो आप कभी भी सभी शर्तो को पूरा नहीं कर सकते तो आप कभी भी तथाकथित जन्नत , स्वर्ग या हेवन में नहीं जा सकते। यानि आप कुछ अतरिक्त नहीं पा सकते। यहाँ यह अतरिक्त का प्रलोभन एक इच्छा पैदा करता है और एक इच्छा को पूरी न हो पाने का डर पैदा होता है। यह डर फिर हमे हमारे पिछले लिख की बातो पर ले जाता है जो कहता है की धर्म का मूल सिद्धांत डर है। प्रलोभन धर्म का दूसरा सिद्वांत है। इस प्रलोभन वाले सिद्वांत का भी धर्म बड़ी अच्छी तरह फायदा उठाते है।  धर्म से जुड़ने...

धर्म का मूल सिद्धांत डर है।

 धर्म का मूल सिद्धांत डर है।  एक बहुत बड़े धर्म गुरु को सुन रहा था, वो कह रहा था कि हमारा धर्म खतरे में है। हमे जिहाद की जरूरत है। हमे पुरे संसार को अपने धर्म में परवर्तित करना है। जब तक पुरे संसार को हम अपने धर्म में परवर्तित नहीं कर लेते तब तक शांति नहीं हो सकती।  क्या वो सही था ? बिलकुल भी नहीं ! अगर आपके मूल में डर है , चाहे वो आपके धर्म के संदर्व में है या दौलत के संदर्व में, शक्ति के संदर्व में है या समझौते के संदर्व में तो आपका डर हमेशा बढ़ता ही जायेगा। जैसे जैसे आपका धर्म बढ़ेगा या आपकी दौलत बढ़ेगी तो आपका डर भी बढ़ता जायेगा।  इसीलिए ये संभव ही नहीं है कि अगर आप अपने धर्म को पूरी दुनिया में फैला लो तो शांति हो जाएगी। बल्कि डर और बढ जायेगा जो अशांति की तरफ लेकर जायेगा। अशांति हिंसा को बढ़ावा देगी और हिंसा बदलाव को। बदलाव आपके धर्म को खत्म कर देगा और एक नया धर्म पैदा होगा।  मतलब जिस डर की वजह से वो चाहता है कि पूरी दुनिया में उसका धर्म फैलना चाहिए , उसी वजह से अंत में वो अपना धर्म खत्म कर लेगा।  केवल यही तर्क नहीं है मेरे कहने का कि धर्म का मूल डर है। ...

राष्ट्र के सविंधान को धर्म निरपेक्ष नहीं होना चाहिए, राष्ट्र के सविंधान को धर्म विमुक्त होना चाहिए।

हम सब अपने आप में एक पूरा संसार होते है।  एक इंसान के तोर पर अगर कहूं तो मेरा संसार केवल मेरे आस पास का जहाँ ही होता है। हममे से ज्यादतर तो अपने पास के 50 से 100 किलोमीटर से ज्यादा के बाहर का संसार कभी देख ही नहीं पाते।  हम अपने धर्म से जुड़े या राजनीती से जुड़े फैसले केवल सुनी हुए या किसी भी तरीके से हम तक पहुंची है। हमे किसी प्रमाण की जरूरत ही महसूस नहीं होती। और न ही हम कभी इस बात पर विचार करते है कि इसका हमारी जिंदगी पर क्या असर होगा। क्या सही है या क्या गलत ? एक बार हम कोई धारणा बना लेते है तो केवल उसका ही अनुसरण करते है। बिना यह सोचे की यह गलत है या सही।  अगर हम भारत की राजनति की बात करते है तो देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा आजादी के बाद से केवल एक राजनैतिक दल को ही वोट डालता था। उसका कारण कुछ भी हो सकता है। पर उसका सबसे मुख्य कारण है - एक धारणा बना लेना की देश पर राज करने का हक़ केवल इनको ही है।  उसके बाद छोटे छोटे बदलाव हुए पर वो धारणा को ज्यादा परवर्तित नहीं कर पाए। लोग परिवर्तन चाहते पर कही न कही फिर भी मन में बसी धारणा उन्हें वो करने से रोकती। फिर हमने लोगो की मान...