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Showing posts from June, 2021

एक आंख से दुनिया कितनी एक लगती है

बहुत बार देखा जाता है कि अगर कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर लेता है तो वो सबसे उम्मीद करता है कि वो भी यही करे या वो सबको बहला कर या जोर से धर्म परिवर्तन की कोशिश करता है।  ऐसा क्यों होता है ? इसका जवाब साधारण सा है।  जब कोई व्यक्ति काना हो जाता है तो उसको लगता है कि वो आँखों वालो के बीच नहीं रह सकता। फिर वो काना होने के फायदे गिनवाने लग जाता है। एक आंख से दुनिया कितनी एक लगती है यह गिनवाने लग जाता है।  ऐसी ऐसी बाते करने लग जाता है जिनका कोई भी तर्क नहीं होता। पहले प्यार से बहकाने की कोशिश करता है और जब कोई नहीं मानता तो वो धमकियां देना शुरू कर देते है।  उनको लगता है कि अगर वो काने हो गए है तो सबको काना कर देंगे। अगर सब काने हो जायेंगे तो उनको शन्ति मिल पायेगी। क्यूंकि धर्म परिवर्तन के बाद एक गलानि सी मन में पैदा हो जाती है और उस गलानि को खत्म करने के लिए और अपने निर्णय को सही साबित करने के लिए वो केवल नए अपनाये धर्म का ही गुणगान करते रहते है और दुसरो को भी यही करने के लिए प्रेरित करता है।  ऐसा नहीं है कि उसको कुछ ज्ञान की प्राप्ति हुए या उसको दूसरे धर्म में ...

कुछ चीज़ो में खुद को नष्ट करने की शक्ति होती है।

 कुछ चीज़ो में खुद को नष्ट करने की शक्ति होती है। यह ज्यादातर चीज़ो में साधारणतय पायी जाती है।  कहते है कि किसी का सही स्वरूप देखना है तो उसको असीमित पैसा और ताकत दे दो। वो क्षण भर में अपना वास्तविक रूप दिखा देगा।  यहाँ से उसके उद्गम की या उसके विनाश की कहानी शुरू होगी।  कुछ व्यक्तियों या चीज़ो में यह प्रवृति होती है कि जब तक उनमे ताकत का या शक्ति का स्तर कम है तब तक वो संतुलित होती है और जैसे ही उनकी ताकत का या शक्ति का स्तर बढ़ता है वो असंतुलित हो जाती है।  तब दो रास्ते होते है। या तो इस अधिक मिली ताकत को नियंत्रित किया जाया या यह उस व्यक्ति, समूह, समाज, देश, धर्म और वस्तु को नष्ट कर देगी।  ऐसा इतिहास में बहुत बार होता है। जब कोई भी व्यक्ति, समूह, समाज, देश, धर्म और वस्तु अपने चरम पर होता है वहाँ उसका पतन शुरू हो जाता है। ऐसा केवल अतरिक्त प्राप्त ताकत या शक्ति को संतुलित न कर पाने से ही होता है।  अतरिक्त शक्ति एक नया नजरिया ले कर आती है। अपने आस पास स्थित दूसरे व्यक्ति, समूह, समाज, देश, धर्म और वस्तु तुच्छ लगने लगते है।  तब शुरू होता है शक्ति क...

ज्यादातर नेता आंदोलन का लाभ नहीं भोग पाते

दुनिया में आंदोलनों या क्रांतियों का इतिहास बड़ा ही रोचक रहा है।  कौन सा आंदोलन/क्रांति सफल रही , कौन सी असफल, कौन सही है , कौन गलत, उसके बारे में यह विचार नहीं है। यह लेख है आंदोलन/क्रांति से जुड़े एक बहुत ही रोचक तत्य के बारे में जो है कि आंदोलन/क्रांति का लाभ हमेशा तीसरा व्यक्ति ले जाता है।  आंदोलन//क्रांति एक तरह से विरोद्ध के रूप में परभाषित होता है। जब एक वर्ग, दूसरे वर्ग /सरकार/ तानाशाह के खिलाफ कोई मुहीम छेड़ता है तो उसको हम आंदोलन या क्रांति का नाम देते है।  जो वर्ग आंदोलन कर रहा होता है उसके कुछ नेता होते है जो उस आंदोलन का मार्गदर्शन करते है। कुछ नेता निस्वार्थ भाव से जुड़े होते है और कुछ स्वार्थ भाव से। ज्यादातर मामलो में हमने देखा है कि जो नेता किसी आंदोलन/क्रांति का नेतृत्व करते है उनमे से ज्यादातर नेता उसका लाभ नहीं भोग पाते। या तो वो मृत्यु पर्यन्त पहुंच जाते है यानि बहुत ही बजुर्ग हो जाते है और किसी और को उसका लाभ भोगना पड़ता है या अगर वो उसको हासिल कर भी ले तो कुछ ही समय में या तो उनकी मृत्यु हो जाती है या उनको उसको छोड़ना पड़ता है।  कुछ बहुत ही कम मा...

किसान आंदोलन मुझे समाजिक कम और राजनितिक ज्यादा लगा।

 2020 में शुरू हुआ किसान आंदोलन मुझे समाजिक कम और राजनितिक ज्यादा लगा।  इसके कहीं कारण है - उसके नेता ही भ्र्ष्ट है। उनका कभी न कभी कोई राजनितिक प्रलोभन रहा है इसीलिए उनसे निष्पक्षता की उम्मीद करना बेमानी है। 2012 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में नेता दाग रहित थे और उनपर आम जनता का विश्वास था।  एक अच्छा नेता कभी भी देश को नुकसान पहुँचाने की बात नहीं करता जब तक उसका उदेश्य राजनितिक न हो। चाहे सरकार उनकी बाते माने या न माने। वो अपने आंदोलन पर अडिग रहते है पर कभी भी देश या समाज को नुकसान पहुँचाने की बात नहीं करते। पर इस आंदोलन में 26 जनवरी वाला कांड और जनता को तंग करते हुए रास्ता रोकने जैसे कृत्य हुए जो केवल राजनितिक ही हो सकते है , समाजिक नहीं।  समाजिक या सुधारवादी आंदोलन का नेता कभी यह नहीं चाहेगा कि उसके अनुनायी किसी मुसीबत में पड़े। पर इस आंदोलन में हमने देखा कि नेताओ ने अपने स्वार्थ के लिए लोगो को क़ानूनी धाराओं में फंसने दिया, पहले उनको उकसाया और बाद में यह कह कर पला जाड़ लिया कि हमारा इनसे कोई संबंध नहीं है।  आंदोलन का शुरूआती उदेश्य केंद्रीय सरकार को गिराना था।...

लोग क्या कहेंगे ?

 मै अपने फैसले किसी और के हिसाब से क्यों लू ? एक समय था जब सब अपनी इच्छा अनुसार फैसले ले रहे थे। उनको इस बात से कोई मतलब नहीं था कि दूसरे व्यक्ति पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।  बात यह नहीं थी कि उनके फैसलों का मेरी जिंदगी पर क्या असर होगा। बात यह थी कि मै उस वक़्त इस स्थिति में नहीं था कि किसी के फैसलों को नकार सकूँ। मै केवल अनुमान लगता था कि अगर ऐसा किया जायेगा तो उसका असर इस तरह नजर आएगा। और मै उनके हर फैसले में कुछ अच्छा होने की संभावना व्यक्त करता था।  अगर उन्होंने कुछ गलत किया तो खुद को यह तस्सली देता था कि वो दिल से बुरे नहीं बस उन्हें यह काम करना पड़ा। फिर मैंने अपने सोचने के नजरिये को बदला और उसके बाद मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ा की दूसरे क्या फैसले ले रहे है क्यूंकि मेने उनके फैसले का खुद पर असर नहीं होने दिया।  मै सोचता और पहले ही यह अनुमान लगता कि मुझे उनकी इच्छा का समान करना चाहिए या नहीं। और मैंने अपनी इच्छाओ का समान करना शुरू कर दिया। शुरू शुरू में मै केवल उनके फैसलों को ही तौलता था परन्तु कुछ समय बाद मैंने खुद ऐसे फैसले करने शुरू कर दिए जहाँ मुझे कोई फर्क नहीं पड़...

किसी का अनुसरण करो पर उनकी बातो को आदेश की तरह न लो

 लोकतंत्र में सबसे बड़ी विडंबना तब आती है जब लोग किसी नेता का अँधा अनुसरण करते है।  अगर नेता अच्छा है तो फिर भी बहुत हद तक यह लोकतंत्र की भलाई ही करेगा। लेकिन अगर नेता अच्छा नहीं है तो दिक़्क़त होनी शुरू हो जाती है।  कहावत है कि  'किसी का अनुसरण करो पर उनकी बातो को आदेश की तरह न लो' लेकिन लोकतंत्र में लोग जिसका अनुसरण करते है उसकी बातो को आदेश की तरह मान कर चलते है चाहे फिर वह गलत हो या सही।  एक अच्छा नेता हमेशा देश की भलाई की बात करता है और एक ख़राब नेता हमेशा व्यक्तिगत, समाजिक, धार्मिक या संघात्मक भलाई की ही केवल बात करता है। उसके लिए इस बात से कोई मतलब नहीं होता की देश पर या समाज के दूसरे तबके पर इसका क्या असर होगा।  उनको केवल अपनी इच्छा पूर्ति से ही मतलब होता है।  देश का भविष्य कौन तय करता है ? जनता या नेता ! जैसी जनता होती है वैसा ही नेता होता है क्यूंकि वह उसके द्वारा ही चुने जाते है।  मै यही समझने की कोशिश कर रहा हूँ कि लोग किसी का अनुसरण क्यों करते है। 

अपना नेता सही तरह चुनना जरूरी है

 साधरणतय: दो तरह के नेता (लीडर) होते है। एक अच्छे और एक बुरे।  दोनों में अंतर् पता करना आसान नहीं होता। दोनों ही बहुत अच्छे वक्ता होते है , दोनों ही सपने दिखाने वाले होते है, दोनों ही यह अहसास कराते है कि वो आपके भले के लिए लड़ रहे है। दोनों के पीछे अच्छी भीड़ होती है। दोनों ही पहली नजर में अच्छे लीडर नजर आते है।  पर दोनों का अनुशरण करने से परिणाम बिलकुल ही विपरीत आता है।  मैंने अपनी जिंदगी में दो बड़े आंदोलन देखे है।  एक 2012 में अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और 2020 का किसान आंदोलन।  दोनों ही बड़े स्तर पर किये गए और दोनों को ही लोगो का बड़ा समर्थन मिला।  पर दोनों में क्या अंतर् है ? दोनों में केवल लीडर का अंतर् है। और यह अंतर् इतना बड़ा है कि इसने इन आंदोलनों के साथ जुड़े लोगो की जिंदगी बदल दी।  अन्ना हजारे की लीडरशिप में उसके साथ जुड़े लोगो ने एक नए भारत का सपना सजाया और उनमे से कुछ भारतीय राजनीती में सफल हुए , कुछ विचारो के परिवर्तन से बिज़नेस में सफल हुए और कुछ दूसरे क्षेत्रो में।  पर किसान आंदोलन के साथ जुड़े लोगो को उसके नेताओ की वजह स...

हर कौम भी एक परिस्थिति में अलग अलग व्यवहार करती है

 किसी भी परिस्थिति में हर व्यक्ति की अलग अलग प्रतिकिर्या होती है। इसी तरह हर कौम भी एक परिस्थिति में अलग अलग व्यवहार करती है। रोहिंग्या लोग भी देश निकर्सित होने के बाद दूसरे देशो में रहने को मजबूर है और तिब्बती लोग भी।  पर दोनों के व्यवहार में आपको जमीन आसमान का फर्क नजर आएगा। पिछले दिनों मै एक खबर पढ़ रहा था जिसमे रोहिंग्यों ने बांग्लादेश के अधिकारियो पर ही पत्थर बाजी कर दी। जबकि बांग्लादेश ने ही उनको शरण दी हुई है। एक अहसान परमोस लोगो की तरह उन्होंने काम किया। जबकि जिस देश ने उनको शरण दी उनका सहयोग उनको देना चाहिए था।  मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होता है। एक व्यक्ति उस समाज का दर्पण होता है जिसमे वो रहता है और समाज उन व्यक्तियों का दर्पण होता है जिसमे वो रहते है। सब आपस में एक दूसरे से जुड़ा हुआ है।  किसी व्यक्तियों के समूह के व्यवहार से आप पूरी कौम की मानसिकता का अंदाजा लगा सकते हो।  कोई यहां पर तर्क दे सकता है कि सभी मनुष्य समान नहीं होते। हर कौम में सभी तरह के लोग होते है।  मै पूरी तरह इस बात से सहमत हूँ। पर जब एक समूह या समाज कोई निर्णय लेता है तो उसमे कही...