धर्म, देश और व्यक्ति, तीनो का जीवन चक्र एक ही तरह चलता है।

धर्म, देश और व्यक्ति, तीनो का जीवन चक्र एक ही तरह चलता है। समय की गणना में या ज्यादा कम में कुछ अंतर् हो सकता है पर इनके जीवन चक्र में बहुत समानताये होती है। 

  • जन्म 
  • बचपन 
  • किशोर अवस्था 
  • जवानी 
  • बुढ़ापा 
  • मौत/अंत 
इसके अलवा इनके कर्मो और प्रवर्ति के हिसाब से यह  तय होता है कि धर्म अपने बुढ़ापे में या देश अपने बुढ़ापे में किस तरह अपना समय व्यतीत करेगा। 
एक व्यक्ति अपने कर्म, अपने विचार, अपने भविष्य के लिए स्वयं जिमेवार होता है। एक धर्म, उसको मानने वाले सभी लोगो के कर्मो, विचारो से अपना भविष्य तय करता है। एक देश, उसके अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी लोगो के कर्मो और विचारो से अपना भविष्य तय करता है। 
एक व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके जन्म से लेकर उसकी किशोर अवस्था तक की घटनाओ पर निर्भर करता है। उसके साथ उसके बचपन में क्या हुआ, किस तरह उसका लालन पालन हुआ, उसका अनुभव किस मामले में क्या था। यह सब उसके व्यक्तित्व को बनाता है। 
दूसरे व्यक्तियों के साथ वो विनर्मता से पेश आता है या स्वार्थ पूर्ण नजरिया रखता है। वो दुसरो की मद्दत करने में तत्पर रहता है या केवल अपना कार्य निकालने में , शांति के साथ अपने आस पास के लोगो के साथ रहता है या लड़ता झगड़ता रहता है इत्यादि। यह सब उसके साथ हुए घटना कर्मो पर बहुत हद तक निर्भर करती है। 
घटना कर्मो के अल्वा, उसको किस तरह शिक्षा दी गयी , वह भी उसके व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। 
बिलकुल समान चीज़े एक राष्ट्र या धर्म पर लागु होती है। पर यहाँ किसी एक के कर्म या व्यक्तित्व उस देश के कर्म या व्यक्तित्व नहीं बनाते बल्कि सयुंक्त रूप से बहुमत के कर्म या व्यक्तित्व उस देश या धर्म का व्यक्तित्व बनाता है। उसी तरह वह देश या धर्म अपने साथ के देशो या धर्मो के साथ आचरण करता है। और कर्मो तथा व्यक्तित्व के आधार पर ही वह देश या धर्म तररकी करता है। 
अगर आपको एक देश को नयी उच्चाईओ पर ले जाना है तो एक बहुत बड़े समूह को उसी तरह व्यवहार करना पड़ेगा।  देखा जाता है कि जब किसी देश के ज्यादातर लोग गरीबी से बाहर निकलना चाहते है तो वो देश गरीबी से बाहर जरूर निकलेगा।  अगर उसके लोग अपनी स्थिति में खुश है तो आप उस देश को कभी भी सफल नहीं कर सकते। यह ही धर्म तथा व्यक्ति के मामले में सटीक होता है। 
अगर हम एक देश के तौर पर सफल नहीं हो पा रहे है तो इसमें उसके राजनेताओ का कोई दोष नहीं है , दोष पुरे समाज का है जो सफल होना ही नहीं चाहता। लोग अपना वोट अपने व्यक्तिगत स्वार्थ में देते है , न की राष्ट्र हित में। एक धर्म गुरु केवल अपने स्वार्थ के लिए ही चुना जाता है। क्यूंकि उसको धर्म गुरु बनाने में लोगो का निजी स्वार्थ होता है , न की किसी योग्य व्यक्ति को बनाया जाये तो असलियत में धर्म गुरु का मुकाम का हक़दार हो। 
एक बारे में एक कहानी सुनाता हूँ - दुनिया का एक धर्म अपने प्रारम्भिक दौर में था। उसका संथापक दुनिया से जा चूका था। तब लोगो के पास अगला धर्म गुरु चुनने का समय था- उनके संथापक का सुझाया हुआ या सबसे शक्तिशाली व्यक्ति। लोगो ने शक्तिशाली व्यक्ति को चुना। कुछ लोग चुप रहे।
उन्होंने उस व्यक्ति को नहीं चुना जो योग्य था उन्होंने उस व्यक्ति को चुना जिसमे उनको अपना स्वार्थ नजर आ रहा था। तो व्यक्तियों के समूह के निर्णय ने एक धर्म का भविष्य बदल दिया। धर्म शांति की राह पर चलेगा या हिंसा के, यह सब एक फैसले से तय हो गया। 
अगर हम कहे की सब तक़दीर का खेल है तो यह केवल अपने दाहित्व से पीछा छुड़ाने वाली बात है। 
अमेरिका, अमेरिका इस लिए है क्युकी वहां के लोगो ने आजाद होने का निर्णय लिया  और अपनी आजादी तक लड़ने या मरने का निर्णय लिया। अगर उनके संघर्ष पर नजर डाले तो लगता है कि संसार का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र होने का दर्जा अमेरिका का अधिकार है। 
अगर हमे एक अच्छा राष्ट्र , एक अच्छा धर्म या एक अच्छा व्यक्ति बनना है तो उसी तरह कार्य करने की जरूरत है , न कि केवल तनिक स्वार्थ के लिए निर्णय लेनी की। 
यहाँ सब आपस में जुड़ा हुआ है। कुछ भी दूसरे से भिन्न नहीं है। एक का असर दूसरे पर पड़ता है। व्यक्ति का असर समाज पर पड़ता है , समाज का असर धर्म पर पड़ता है और धर्म का असर राष्ट्र पर पड़ता है। 
अगर समाज का असर सीधा राष्ट्र पर डालना है तो धर्म से विमुक्त राष्ट्र की जरूरत है। 

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