प्रलोभन धर्म का दूसरा सिद्वांत है।
कल मेरे से कुछ ऐसा हुआ जिससे मुझे अहसास हुआ कि हम जिंदगी भर कुछ अतरिक्त पाने में लगे रहते है। पर उस अतरिक्त के साथ कुछ शर्ते जुडी रहती है।
कुछ ऐसा ही धर्मो के साथ भी होता है। हर धर्म एक ऐसी जन्नत , स्वर्ग या हेवन देने का प्रलोभन देता है जो हमारी जिंदगी में हमे कुछ अतरिक्त पाने का अहसास दिलाता है। पर इस तथाकथित जन्नत , स्वर्ग या हेवन को पाने के लिए कुछ शर्ते होती है।
ग्रंथो के हिसाब से धर्म वक्ता आपको वो सारी शर्ते बता देंगे पर हर शर्त के साथ एक दूसरी शर्त जुडी होती है जो इस प्रक्रिया को और ज्यादा जटिल बना देती है। अगर व्यवारिक तौर पर बात करे तो आप कभी भी सभी शर्तो को पूरा नहीं कर सकते तो आप कभी भी तथाकथित जन्नत , स्वर्ग या हेवन में नहीं जा सकते। यानि आप कुछ अतरिक्त नहीं पा सकते।
यहाँ यह अतरिक्त का प्रलोभन एक इच्छा पैदा करता है और एक इच्छा को पूरी न हो पाने का डर पैदा होता है। यह डर फिर हमे हमारे पिछले लिख की बातो पर ले जाता है जो कहता है की धर्म का मूल सिद्धांत डर है।
प्रलोभन धर्म का दूसरा सिद्वांत है।
कुछ ऐसा ही धर्मो के साथ भी होता है। हर धर्म एक ऐसी जन्नत , स्वर्ग या हेवन देने का प्रलोभन देता है जो हमारी जिंदगी में हमे कुछ अतरिक्त पाने का अहसास दिलाता है। पर इस तथाकथित जन्नत , स्वर्ग या हेवन को पाने के लिए कुछ शर्ते होती है।
ग्रंथो के हिसाब से धर्म वक्ता आपको वो सारी शर्ते बता देंगे पर हर शर्त के साथ एक दूसरी शर्त जुडी होती है जो इस प्रक्रिया को और ज्यादा जटिल बना देती है। अगर व्यवारिक तौर पर बात करे तो आप कभी भी सभी शर्तो को पूरा नहीं कर सकते तो आप कभी भी तथाकथित जन्नत , स्वर्ग या हेवन में नहीं जा सकते। यानि आप कुछ अतरिक्त नहीं पा सकते।
यहाँ यह अतरिक्त का प्रलोभन एक इच्छा पैदा करता है और एक इच्छा को पूरी न हो पाने का डर पैदा होता है। यह डर फिर हमे हमारे पिछले लिख की बातो पर ले जाता है जो कहता है की धर्म का मूल सिद्धांत डर है।
प्रलोभन धर्म का दूसरा सिद्वांत है।
इस प्रलोभन वाले सिद्वांत का भी धर्म बड़ी अच्छी तरह फायदा उठाते है।
धर्म से जुड़ने के बाद हमे कुछ अतरिक्त मिलने का प्रलोभन दिया या दिखाया जाता है। कुछ आधुनिक धर्म कहते है कि अगर आप हमारे धर्म को अपनाओगे तो आपको जन्नत , स्वर्ग या हेवन तो मिलेगी ही मिलेगी। यानि ये धर्म आपको कुछ अतरिक्त देने का 100 % आश्वासन देते है। यह गारंटी देते है कि धर्म अपनाना ही वह शर्त है जिससे आपको तथाकथित जन्नत , स्वर्ग या हेवन मिल जायेंगे।
उसके बाद आप खून करो , बलात्कार करो या कुछ भी ऐसा करो जो आधुनिक समाज में करना उचित नहीं है पर हमारा धर्म आपको वह सब करने का अधिकार देता है।
प्रलोभन और डर आपस में जुड़े हुए प्रतीत होते है। प्रलोभन का तब तक कोई लाभ नहीं जब तक उसके छीनने या न मिलने का डर न हो। इसीलिए डर के बाद में प्रलोभन को रखता हूँ जब भी धर्म से जुडी बात आती है।
मै प्रलोभन को धर्म का दूसरा सिद्वांत मानता हूँ जिस कारण वैज्ञानिक दौर में भी धर्म अपने अस्तित्व को बचा पाने में सफल हो पाया है।
पुराने समय में लोगो के पास जरूरी आवश्यक चीज़े भी नहीं होती थी तो वह खुद की रक्षा या जरूरी चीज़ो के लिए तथाकथित भगवान ,आल्हा, गॉड को याद करता था। किन्तु आज के दौर में मनुष्य के पास कानूनन सुरक्षा है, आराम की हर चीज़ है तो आज के दौर में मनुष्य कुछ अतरिक्त पाने की चाह में धर्म की चादर ओढे रखते है।
और कमाल की बात यह है कि यह अतरिक्त पाने की लालसा हमारे मन को शांति प्राप्त नहीं होने देती। और धर्म अपने असली उदेश्य से भटक जाता है। क्युकी ज्यादातर धर्मो का मुख्य लक्ष्य शांति ही होता है।
धर्म बड़ा ही उलझन भरा विषय है। ये बड़ा वाद विवाद से भरा हुआ विषय भी है पर मै अपने नजरिये में इस पर बहुत अध्यनन की जरूरत है।
हर धर्म ने कुछ उसके उद्गम के समय के ज्ञात वैज्ञानिक तर्क भी अपने साथ जोड़े हुए है जो उनको कुछ हद तक इस वैज्ञानिक दौर में संरक्षण देते है पर यह मात्र एक छलावा है। क्यूंकि प्राचीन लोगो को भी विज्ञानं का काफी ज्ञान था और या सब तर्क उन्होंने उस समय के पहले या तत्कालीन बुद्धिजीवी लोगो के कार्यो से चोरी किये हुए है।
अगर मै आज किसी धर्म की स्थापना करता हूँ तो मै 8 ग्रह लिखूंगा , धरती गोल है लिखूंगा, अपने वर्तमान देश के सविंधान के हिसाब से उसके नियम बनाऊंगा। और ऐसा ही इन धर्मो को बनाने वालो ने किया।
उन्होंने उस समय मजूद लिखी, सुनी या ज्ञात ज्ञान को इकठा किया और अपने धर्म ग्रथो में अपनी सहूलियत के हिसाब से जमा घटा करके व्यक्त कर दिया।
और डर तथा प्रलोभन को एक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया जो वैज्ञानिक न होकर मनोविज्ञानिक है।
डर तो प्रकृति में एक समान्य है। एक छोटा जीव बड़े जीव से डरता है। हिरण शेर से डरता है, चूहा बिल्ली से डरता है, बिल्ली कुतो से डरती है और यह लाखो सालो से चला आ रहा है। प्रलोभन मनुष्य के स्वभाव में कब शामिल हुआ यह एक शोध का विषय है।
अधिक: राष्ट्र के सविंधान को धर्म निरपेक्ष नहीं होना चाहिए, राष्ट्र के सविंधान को धर्म विमुक्त होना चाहिए।
अधिक: राष्ट्र के सविंधान को धर्म निरपेक्ष नहीं होना चाहिए, राष्ट्र के सविंधान को धर्म विमुक्त होना चाहिए।