किसी का अनुसरण करो पर उनकी बातो को आदेश की तरह न लो

 लोकतंत्र में सबसे बड़ी विडंबना तब आती है जब लोग किसी नेता का अँधा अनुसरण करते है। 

अगर नेता अच्छा है तो फिर भी बहुत हद तक यह लोकतंत्र की भलाई ही करेगा। लेकिन अगर नेता अच्छा नहीं है तो दिक़्क़त होनी शुरू हो जाती है। 

कहावत है कि  'किसी का अनुसरण करो पर उनकी बातो को आदेश की तरह न लो'

लेकिन लोकतंत्र में लोग जिसका अनुसरण करते है उसकी बातो को आदेश की तरह मान कर चलते है चाहे फिर वह गलत हो या सही। 

एक अच्छा नेता हमेशा देश की भलाई की बात करता है और एक ख़राब नेता हमेशा व्यक्तिगत, समाजिक, धार्मिक या संघात्मक भलाई की ही केवल बात करता है। उसके लिए इस बात से कोई मतलब नहीं होता की देश पर या समाज के दूसरे तबके पर इसका क्या असर होगा। 

उनको केवल अपनी इच्छा पूर्ति से ही मतलब होता है। 

देश का भविष्य कौन तय करता है ?

जनता या नेता !

जैसी जनता होती है वैसा ही नेता होता है क्यूंकि वह उसके द्वारा ही चुने जाते है। 

मै यही समझने की कोशिश कर रहा हूँ कि लोग किसी का अनुसरण क्यों करते है। 

Popular posts from this blog

धर्म, देश और व्यक्ति, तीनो का जीवन चक्र एक ही तरह चलता है।

प्रलोभन धर्म का दूसरा सिद्वांत है।