धर्म का मूल सिद्धांत डर है।

 धर्म का मूल सिद्धांत डर है। 

एक बहुत बड़े धर्म गुरु को सुन रहा था, वो कह रहा था कि हमारा धर्म खतरे में है। हमे जिहाद की जरूरत है। हमे पुरे संसार को अपने धर्म में परवर्तित करना है। जब तक पुरे संसार को हम अपने धर्म में परवर्तित नहीं कर लेते तब तक शांति नहीं हो सकती। 

क्या वो सही था ?

बिलकुल भी नहीं !

अगर आपके मूल में डर है , चाहे वो आपके धर्म के संदर्व में है या दौलत के संदर्व में, शक्ति के संदर्व में है या समझौते के संदर्व में तो आपका डर हमेशा बढ़ता ही जायेगा। जैसे जैसे आपका धर्म बढ़ेगा या आपकी दौलत बढ़ेगी तो आपका डर भी बढ़ता जायेगा। 

इसीलिए ये संभव ही नहीं है कि अगर आप अपने धर्म को पूरी दुनिया में फैला लो तो शांति हो जाएगी। बल्कि डर और बढ जायेगा जो अशांति की तरफ लेकर जायेगा। अशांति हिंसा को बढ़ावा देगी और हिंसा बदलाव को। बदलाव आपके धर्म को खत्म कर देगा और एक नया धर्म पैदा होगा। 

मतलब जिस डर की वजह से वो चाहता है कि पूरी दुनिया में उसका धर्म फैलना चाहिए , उसी वजह से अंत में वो अपना धर्म खत्म कर लेगा। 

केवल यही तर्क नहीं है मेरे कहने का कि धर्म का मूल डर है। 

आप किसी भी धर्म गुरु या धार्मिक व्यक्ति के सामने धर्म पर वार्तालाप कर लो जब उसके पास तर्क खत्म हो जायेंगे तब वो डर दिखायेगा, कुछ गलत होने का भय दिखायेगा। 

ज्यादातर आपको यह सुनने को मिलेगा कि भगवान से डर, आल्हा से डर , गॉड से डर इत्यादि। पर क्या कोई इस बात को प्रमाणित कर सकता है कि इनमे से हमे किसी से डरने की जरूरत है। 

भगवान,आल्हा, गॉड को हम सब कही न कही एक पालनकर्ता, पिता या परमपिता मानते है। तो क्या किसी पिता से उसके बच्चो को डरने की जरूरत है। क्या कोई पिता यह चाहेगा कि उसके बच्चो को डरा कर कोई अपना काम निकलवाता रहे। पिता को इज्जत दी जाती है , न की उनसे डरा जाता है। हर पिता यही चाहता है कि उसके बच्चे हंसी ख़ुशी से जिंदगी गुजारे बिना किसी के भय या डर के। पर यहाँ तो उसके नाम से ही उसको डराया जा रहा है। 

क्यों?

क्युकी खुद को धर्म के रखवाले कहने वाले लोगो को लगता है कि जिस दिन डर खत्म हो गया उसी दिन उनका धर्म खत्म हो जायेगा। इसी वजह से इतने सारे रीती रिवाज, ओढ़ने के वस्त्र, क्या पहना है, क्या नहीं, क्या करना है, क्या खाना है , क्या नहीं खाना है इत्यादि, यह सब बनाया गया। 

आज के दौर में मजूद ज्यादातर धर्म 5000 साल से पुराने नहीं है। और धरती की उम्र 4.5 अरब वर्ष बताई जाती है तो क्या 5000 से पहले धरती बिना किसी भगवान, आल्हा, गॉड के घूम रही थी या ये धर्म का नाटक केवल शासन करने के लिए है। 

इतिहास उठाकर अगर हम देखते है तो मुख्य धर्म उपदेशक (दूत) के मरने के बाद ही ज्यादातर धर्मो में धर्म ग्रन्थ लिखे गए और सभी धर्मो का मानना है कि उनके धर्म ग्रन्थ स्वयं उनके परमपिता ने उनको दिए है। उनसे पूछो की कि उनके परमपिता के बारे में उनको किसने बताया तो वो कहेंगे की उनके मुख्य धर्म उपदेशक ने ज्ञान दिया। 

उनके मुख्य उपदेशक को कहाँ से ज्ञान मिला तो स्वंय उनके परमपिता ने दिया। 

चलो मान लिया की तुम्हारे परमपिता ने अपना दूत भेजा और सबको ज्ञान की प्राप्ति हुई। दूत चला गया। उसने कुछ नहीं लिखा।  उसने उपदेश  दिया , किसी ने कुछ नहीं लिखा। सुना और ग्रहण कर लिया। लिखा भी होगा तो बहुत कम। 

अब दूत के चले जाने की बाद अब धर्म को साथ रखने के लिए किसी ग्रन्थ की जरूरत महसूस हुए।  तो लगा की ग्रन्थ लिखा जाये, अब दूत है नहीं, जो परमपिता से पूछ कर उनके विचार लिख दे। फिर एक बहुत बड़े सड़यंत्र के तहत ग्रन्थ लिखे गए। लिखा लोगो ने और नाम दिया की स्वंय परमपिता ने भेजा है। क्यूंकि अगर कहते कि ये तो हमने लिखा है तो कोई भी उसमे लिखी बेतुकी बातो को चनौती दे देता। अगर कहा कि परमपिता ने लिखी है तो चाहे कितनी मनगढ़ंत कहानियां किस्से हो, बेतुके रीती रिवाज़ हो, बिना मतलब के तर्क हो पर आप उसे चनौती नहीं दे सकते क्यूंकि आपको परमपिता से डरना चाहिए। 

वो नाराज हो गए तो तुम्हारा नाश कर देंगे। तुम्हे कष्ट देंगे। पर मरने के बाद तुम्हे स्वर्ग ही मिलेगा।  चाहे तुम लोगो को जितना कष्ट दो, बलात्कार करो, लोगो को मारो, परेशान करो इत्यादि। 

गहराई से अगर देखने की कोशिस करोगे तो पाओगे।  सभी धर्मो के धर्म ग्रन्थ केवल उस वक़्त के कुछ लोगो ने शाशन करने के लिए बनवाये। उनके पास लिखने को कुछ नहीं था तो उन्होंने पहले से विधमान धर्मो के ग्रंथो से किस्से कहानिया और समान चुराया फिर अपने मन मुताबिक उसमे से कुछ हटाया और कुछ जोड़ा ताकि उनको शाशन करने में कोई दिक्कत न हो। 

अगर कोई भगावत करता तो उसको धर्म विरोधी सिद्ध कर दिया जाता। अब सत्ता हाथ में रखने के लिए धर्म का ऐसा गन्दा नाच इतिहास की गोद में दफ़न है कि हम लोग आज के समय में कल्पना भी नहीं कर सकते। 

अपने से पुराने धर्म के ग्रंथो में से समान चुराना गलत नहीं है पर अगर आपका धर्म पहले वाले धर्म को ख़राब मानता है। उसको पूरी तरह से खत्म करना चाहता है तो फिर उसके ग्रंथो में लिखी बाते भी गलत ही होनी चाहिए। अगर वो गलत है तो उनको अपने धर्म में इस्तमाल क्यों करना। 

कुछ लोग कहेंगे की ग्रंथो में लिखी बाते तो सही थी पर लोग गलत थे। अगर ऐसा है तो लोगो को बदलना था धर्म को नहीं। पर ऐसा नहीं था। 

अब प्रश्न आता है कि वो कौन लोग थे जिन्होंने धर्म को अपने फायदे के लिए उपयोग किया। 

अगर हम इतिहास का अध्ययन करते है तो पाते है कि दूत एक तरह से समाजिक सुधार लेकर आये। उन्होंने महसूस किया कि कुछ गलत हो रहा है जो समाज में नहीं होना चाहिए। उन्होंने एक समाज सुधारक का काम किया। उनके साथ एक बहुत ही बड़ा लोगो का समूह जुड़ा। 

उनके इस कार्य ने समाज को और सभ्य बनने की और प्रेरित किया। पर कहते है किसी भी समाज का निर्माण इस बात पर निर्भर नहीं करता कि दुष्ट लोग क्या कर रहे है पर इस बात पर निर्भर करता है की अच्छे लोग क्या कर रहे है। 

यह बात दूतो की मौत के बाद धर्मो पर भी लागु होती है। दूतो के मर जाने के बाद इस बड़े समूह पर शासन करने के लिए संघर्ष तो होना ही था। अब क्या होता है कि आम लोगो के बस का ज्ञान नहीं होता , वो वही चल देते है जहाँ ज्यादातर लोग चल देते है। जो सब करने लग जाते है जो सब कर रहे है। 

केवल मुठी भर ही ऐसे होते है जो यह सोचने का कष्ट करते है कि अब क्या हो सकता है।  इन मुठी भर लोगो में से भी कुछ लोग ऐसे होते है जो यह सोचने का कष्ट करते है कि समाज का भला किसमे है। बाकि के कुछ लोग केवल अपना स्वार्थ निकालने का काम करते है और कौन ज्यादा अच्छी तरह से काम करता है उसपर उस धर्म का भविष्य निर्धारित होता है। 

ज्यादातर मामलो में दुष्ट लोग ही अपना स्वार्थ पूरा कर पाते है और अच्छे लोगो को पता होते हुए भी की क्या सही है आवाज नहीं उठाते। और नया धर्म जो अपने आप को अच्छा मानता है , बिना महसूस हुए पुरानी धारणाओं को और उन्ही रीती रिवाजो को मानने लग जाता है जिनसे उनका दूत उनको मुक्ति दिलाना चाहता था। 

नए धर्म में सबको लगता है कि वो इन सब रीती रिवाज़ो को मान कर अपने दूत का अनुसरण कर रहे है किन्तु वो उनका अनुशरण करना तो सालो पहले छोड़ चुके है। वो अनुशरण कर रहे उनका जिनसे उनका दूत मुक्ति दिलाने आया था। क्यूंकि डर ने सोचने समझने की शक्ति को खत्म कर दिया। 

इसी वजह से धर्म में केवल डराया जाता है क्यूंकि यह सबसे अचूक इलाज है किसी भी तर्क वितर्क को खत्म करने का। किसी भी विरोध को खत्म करने का। एक बड़े समूह को अपने साथ बनाये रखने का, उनको चंद लोगो की गुलामी कराते रहने का। 

सच तो यह है कि जबसे इंसान थोड़ा सभ्य होया, उसने सोचना शुरू किया कि यह सब कैसे होता है तो उसने एक कल्पना की कि कोई न कोई शक्ति है जो सब कुछ चलाती है। उसके बाद हमने यह मान लिया कि अगर वो नाराज हो जायेगा तो हमारा बुरा करेगा। और हम सब इस डर के गुलाम बन गए। 

यह डर ही हर धर्म की नींव है। 


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