वैश्विक संस्थाओ की सच्चाई !

जब भी विश्व जुड़े किसी संगठन की बात आती है या पर्यावरण से जुड़े या जीवो से जुड़े या किसी भी ऐसे संगठन जो लोक हित में बनाया गया हो। उसको बनाने का उदेश्य हो सकता है अच्छा रहा हो परन्तु कुछ समय बाद वह किसी न किसी देश, कंपनी या व्यक्ति इत्यादि के हाथो की कठपुतली ही बन कर रह जाता है।
अगर हम कुछ संगठनो की बात करे जैसे सयुंक्त राष्ट्र संघ, विश्व स्वास्थ्य संगठन, संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन, पीपुल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स, पर्यावरण संगठन तथा ओर भी बहुत सारी सामाजिक संस्थाएं एक अच्छे ध्यये के लिए शुरू हुए थे और उनके पीछे एक महान प्ररेणा थी। पर समय के साथ ज्यादातर संगठन अपने वास्तविक उदेश्य से भटक गए और केवल किसी देश, व्यक्ति या संस्था के हाथ की कटपुतली बन जाते है और फिर वो दान लेने के लिए या जिस देश, संस्था या व्यक्ति से अधिक दान मिल रहा होता है इसके हिसाब से कार्य करने लग जाते है।
दुनिया के सारे संगठन अपने नाम के पीछे अपने काले कारनामे छुपाने की कोशिश करते है या कुछ लोग अपने स्वार्थ के लिए इनके पीछे छिपने की कोशिश करते है।
इसीलिए किसी भी संगठन पर विश्वास खुद के साथ किये गए आत्म विश्वासघात के बराबर होता है।
बहुत सारे मामलो में आप हर संगठन के दोहरे , तिहरे या यह कहे गिरगिट की तरह रंग बदलते रूप को देख सकते हो।
अगर उदाहरण दूँ तो अगर आप सयुंक्त राष्ट्र संघ को लेते है तो वह हथियारों पर लगाम लगाने की बात करता है और शन्ति बनाये रखने की बात करता है। ऐसा वह केवल तब करता है जब कोई गरीब या विकाशील देश हथियार खरीद रहा हो या कोई देश अमेरिका या चीन के अल्वा किसी और से खरीद रहा हो पर जब उसके मुख्य दान दाता देशो का हित उससे जुड़ा हो तो वह ऐसा प्रदर्शन करेगा कि जो हो रहा है उसका उसको आभास भी नहीं है।
सयुंक्त राष्ट्र संघ की इसी कमजोरियों की वजह से आंतकवाद को प्रोत्साहन मिलता है और युद्ध होते रहते है। अगर सयुंक्त राष्ट्र संघ किसी भी देश के हथियार बनाने पर ही पाबन्दी लगा दे तो। 
पर वह ऐसा नहीं करेगा क्यूंकि हथियार तो अमेरिका और यूरोप के देश ही बनाते है और उनकी आय को वो बंद नहीं कर सकता।
सयुंक्त राष्ट्र संघ उस दिन हथियार पर प्रतिबन्द लगाने पर विचार करेगा जब भारत जैसे देश इसका निर्यात शुरू कर देंगे क्यूंकि तब सयुंक्त राष्ट्र संघ के बॉस देशो के हितो का नुकसान होगा।
अगर यकीं नहीं आता तो परमाणु हथियारों की ही बात कर लेते है। जब तक अमेरिका, रूस, चीन या यूरोप के देश परमाणु हथियार बना रहे थे तो सयुंक्त राष्ट्र संघ चुप था जैसे ही भारत या दूसरे देशो में इसको बनाना शुरू किया तो संधि लागू करने पर जोर दिया जाने लगा।
इसी तरह पर्यावरण के मामले में भी ऐसा ही होता है। जब विकसित राष्ट्र प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर रहे थे तब तक सब ठीक था किन्तु जैसे ही विकासशील देशो ने खुद का उत्पादन बढ़ाना शुरू किया और आयात की जगह विकसित राष्ट्रों को निर्यात करना शुरू किया तो उनको फिक्र होने लगी की जलवायु परिवर्तन होने लगा है। इसके लिए संस्थाएं बनने लगी। पहले बुद्धिजीवी लोगो ने यह अभियान चलाया। जब उनसे न बनी तो उन्होंने स्कूल के बच्चो को आगे रख कर उनके कंधो से निशाना बनाना शुरू किया।
इसी तरह शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन भी केवल दुनिया में धर्मो का प्रचार का ही काम करते है, बजाय इसके कि वो अपना वास्तविक काम करे। क्यूंकि अगर वो अपना वास्तविक काम करेंगे तो उनको चंदा कहाँ से मिलेगा। इसी लिए वो गरीब राष्ट्रों के लोगो की मद्द्त के बहाने धर्म परिवर्तन की कोशिश में ज्यादा करते है और मद्द्त कम। या यूँ कहे कि मद्द्त करने का केवल ढोंग करते है। 
यह सब संगठन अपना वास्तविक काम करते नजर जरूर आते है पर वास्तव में यह किसी न किसी देश, कंपनी, संस्था या व्यक्ति के हाथ की कठपुतली होते है।
ज्यादा तर गैर सरकारी संस्थाएं इसी तरह काम करती है।
हाथी के दांत दिखाने के कुछ और खाने के कुछ।

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