किसान आंदोलन मुझे समाजिक कम और राजनितिक ज्यादा लगा।

 2020 में शुरू हुआ किसान आंदोलन मुझे समाजिक कम और राजनितिक ज्यादा लगा। 

इसके कहीं कारण है -

उसके नेता ही भ्र्ष्ट है। उनका कभी न कभी कोई राजनितिक प्रलोभन रहा है इसीलिए उनसे निष्पक्षता की उम्मीद करना बेमानी है। 2012 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में नेता दाग रहित थे और उनपर आम जनता का विश्वास था। 

एक अच्छा नेता कभी भी देश को नुकसान पहुँचाने की बात नहीं करता जब तक उसका उदेश्य राजनितिक न हो। चाहे सरकार उनकी बाते माने या न माने। वो अपने आंदोलन पर अडिग रहते है पर कभी भी देश या समाज को नुकसान पहुँचाने की बात नहीं करते। पर इस आंदोलन में 26 जनवरी वाला कांड और जनता को तंग करते हुए रास्ता रोकने जैसे कृत्य हुए जो केवल राजनितिक ही हो सकते है , समाजिक नहीं। 

समाजिक या सुधारवादी आंदोलन का नेता कभी यह नहीं चाहेगा कि उसके अनुनायी किसी मुसीबत में पड़े। पर इस आंदोलन में हमने देखा कि नेताओ ने अपने स्वार्थ के लिए लोगो को क़ानूनी धाराओं में फंसने दिया, पहले उनको उकसाया और बाद में यह कह कर पला जाड़ लिया कि हमारा इनसे कोई संबंध नहीं है। 

आंदोलन का शुरूआती उदेश्य केंद्रीय सरकार को गिराना था। न कि कुछ बदलाव करना। बदलाव और शर्ते बहुत बाद में एक सुरक्षात्मक तौर पर या खुद को मजबूती देने के लिए जुडी गयी। उससे जुड़े हर शख्स को यकीन था कि वो मात्र 15 दिन में सरकार गिरा देंगे। कुछ समय बाद उनका भ्र्म टूटा तो उनका लक्ष्य हरियाणा सरकार को गिराना हो गया। मतलब उनको किसी न किसी तरह सरकार को गिराना था। 

आंदोलन में खालिस्तानी झंडे और नारे शुरुआत में आम थे पर जब विरोध बढ़ने लगा तब गायब होने लगे। डर सबको लगता है। गला सबका सूखता है इसीलिए यह सब कुछ दिन बाद बंद हो गया। 

यह आंदोलन केवल दो राज्यों में ही सिमट कर रह गया। और ज्यादातर मामलू में आंदोलन से जुड़ा कुछ भी लागु करने के लिए उतना जनसमर्थन नहीं मिल पाया सबकुछ गुंडा गर्दी से लागु कराया गया। 

सबसे रोचक बात यह आंदोलन अमीर लोगो और सदृढ़ जातियों का आम जनता के खिलाफ आंदोलन ज्यादा लगा बजाये इसके कि यह सरकार के खिलाफ था। इस आंदोलन के नेताओ ने जो भी किया आम जनता की ही परेशानी बढ़ी। जिसकी वजह से आम जनता में एक छुपा रोष आंदोलन के प्रति हो गया। आम लोग चाहे कुछ कह न पा रहे हो पर वो इस आंदोलन से नफरत करने लगे है। 

किसान आंदोलन का इस आंदोलन में केवल नाम रह गया। यह आंदोलन एक सशक्त कोम और एक सशक्त जाति का ही बनकर रह गया। वह अपने साथ गरीब जनता और मजदुर वर्ग का समर्थन हासिल करने में कामयाब नहीं रहा। 



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