एक आंख से दुनिया कितनी एक लगती है

बहुत बार देखा जाता है कि अगर कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर लेता है तो वो सबसे उम्मीद करता है कि वो भी यही करे या वो सबको बहला कर या जोर से धर्म परिवर्तन की कोशिश करता है। 

ऐसा क्यों होता है ?

इसका जवाब साधारण सा है। 

जब कोई व्यक्ति काना हो जाता है तो उसको लगता है कि वो आँखों वालो के बीच नहीं रह सकता। फिर वो काना होने के फायदे गिनवाने लग जाता है। एक आंख से दुनिया कितनी एक लगती है यह गिनवाने लग जाता है। 

ऐसी ऐसी बाते करने लग जाता है जिनका कोई भी तर्क नहीं होता। पहले प्यार से बहकाने की कोशिश करता है और जब कोई नहीं मानता तो वो धमकियां देना शुरू कर देते है। 

उनको लगता है कि अगर वो काने हो गए है तो सबको काना कर देंगे। अगर सब काने हो जायेंगे तो उनको शन्ति मिल पायेगी। क्यूंकि धर्म परिवर्तन के बाद एक गलानि सी मन में पैदा हो जाती है और उस गलानि को खत्म करने के लिए और अपने निर्णय को सही साबित करने के लिए वो केवल नए अपनाये धर्म का ही गुणगान करते रहते है और दुसरो को भी यही करने के लिए प्रेरित करता है। 

ऐसा नहीं है कि उसको कुछ ज्ञान की प्राप्ति हुए या उसको दूसरे धर्म में जाकर कुछ शांति मिली। बल्कि उसको आत्म ग्लानि और डर की प्राप्ति हुए जिसको शांत करने के लिए और अपने निर्णय को सही सिद्ध करने के लिए वो केवल नए धर्म का ही गुणगान करता रहता है। 

इस ग्लानि और अंतर्दवंद से पूरी जिंदगी छुटकारा नहीं मिलता। अगली पीढ़ी को यह सहना नहीं पड़ता क्यूंकि उसका पालन पोषण ही नए धर्म में हुआ है तो वो उसका हो कर रहता है फिर भी मैंने अपने अध्ययन से पाया है कि आने वाली कहीं पीढ़ी तक अपने पूर्वजो के फैसलों को सही सिद्ध करने का प्रयास करती रहती है। 

यह भारत में मुख्यता देखा गया है कि परवर्तित लोग अपने मूल धर्म को हमेशा ही गलत साबित करने का प्रयास करते रहते है। क्यूंकि उनकी ग्लानि को तभी शांति मिलती है जब वो अपने मन को समझा ले की उनके पूर्वजो ने परिवर्तित होकर सही निर्णय लिया था। 

पर जैसे मै बहुत बार कहता हूँ सभी धर्म झूठ पर आधारित है और उनकी लिखी किताबे वैज्ञानिक तत्यो पर खरी नहीं उतरती तो उनके भगवान, आल्हा, गॉड,जीसस या जो भी नाम से वो उनको बुलाते है वो मात्र सत्ता पाने का साधन थे। अतीत में भी और वर्तमान में भी। 

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