लोग क्या कहेंगे ?
मै अपने फैसले किसी और के हिसाब से क्यों लू ?
एक समय था जब सब अपनी इच्छा अनुसार फैसले ले रहे थे। उनको इस बात से कोई मतलब नहीं था कि दूसरे व्यक्ति पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।
बात यह नहीं थी कि उनके फैसलों का मेरी जिंदगी पर क्या असर होगा। बात यह थी कि मै उस वक़्त इस स्थिति में नहीं था कि किसी के फैसलों को नकार सकूँ। मै केवल अनुमान लगता था कि अगर ऐसा किया जायेगा तो उसका असर इस तरह नजर आएगा। और मै उनके हर फैसले में कुछ अच्छा होने की संभावना व्यक्त करता था।
अगर उन्होंने कुछ गलत किया तो खुद को यह तस्सली देता था कि वो दिल से बुरे नहीं बस उन्हें यह काम करना पड़ा।
फिर मैंने अपने सोचने के नजरिये को बदला और उसके बाद मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ा की दूसरे क्या फैसले ले रहे है क्यूंकि मेने उनके फैसले का खुद पर असर नहीं होने दिया।
मै सोचता और पहले ही यह अनुमान लगता कि मुझे उनकी इच्छा का समान करना चाहिए या नहीं। और मैंने अपनी इच्छाओ का समान करना शुरू कर दिया। शुरू शुरू में मै केवल उनके फैसलों को ही तौलता था परन्तु कुछ समय बाद मैंने खुद ऐसे फैसले करने शुरू कर दिए जहाँ मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि दूसरे मेरे बारे में क्या सोचते है।
फैसले चाहे गलत थे या सही। पर मै अपने फैसले के लिए खुद जिम्मेवार था। मै कुछ गलत होने पर सारी जिम्मेवारी लेने को तैयार था और सही होने पर पर भी।
दूसरे मेरे बारे में क्या सोचेंगे जबसे अपने दिमाग से निकाला तब से मेरे जीवन में एक परिवर्तन होना शुरू हुआ। अब भी मै बहुत बार यह सोचता हूँ कि लोग क्या कहेंगे पर मुझे बाद में बहुत अफसोस होता है अगर मै कोई कार्य इसलिए नहीं करता।